15 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद कांग्रेस-गोवा फॉरवर्ड गठबंधन की शानदार जीत: गोवा विश्वविद्यालय छात्र परिषद चुनाव में नया दौर शुरू

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गोवा, 23 दिसंबर 2025: गोवा विश्वविद्यालय के छात्र परिषद (जीयूएससी) चुनाव में एक ऐतिहासिक मोड़ आ गया है। 15 वर्षों के लंबे सूखे के बाद कांग्रेस-गोवा फॉरवर्ड पार्टी (जीएफपी) गठबंधन ने सभी प्रमुख पदों पर कब्जा जमाकर छात्रों का भरोसा जीत लिया है। यह जीत न केवल छात्र राजनीति में एक नई हवा का संकेत है, बल्कि राज्य की समग्र राजनीति में विपक्षी एकता की ताकत को भी रेखांकित करती है। कुनकोलीम के साई देसाई को अध्यक्ष पद पर चुने जाने के साथ ही गठबंधन ने परिषद के सभी प्रमुख पदों—उपाध्यक्ष, महासचिव, कोषाध्यक्ष और संयुक्त सचिव—पर अपनी उम्मीदवारों को विजयी बनाया। यह परिणाम छात्रों के बीच बदलते मनोबल और युवा नेतृत्व की उभरती ताकत को दर्शाता है।

गोवा विश्वविद्यालय, जो राज्य का प्रमुख उच्च शिक्षा संस्थान है, यहां छात्र परिषद चुनाव हमेशा से राज्य की राजनीति का आईना रहा है। 2010 के बाद से भाजपा-समर्थित छात्र संगठनों का दबदबा रहा, जिसने परिषद को लंबे समय तक नियंत्रित रखा। लेकिन इस बार, राष्ट्रीय छात्र संघ (एनएसयूआई) और जीएफपी की युवा शाखा के संयुक्त प्रयासों ने चमत्कार कर दिखाया। चुनाव प्रक्रिया 16 दिसंबर को शुरू हुई थी, जिसमें पहले चरण में कैंपस छात्र संघ (जीयूसीएसयू) के परिणाम घोषित हुए। दूसरे चरण में, जो 20-22 दिसंबर को आयोजित हुआ, गठबंधन ने 70% से अधिक वोट शेयर हासिल किया। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, कुल 2,500 से अधिक छात्रों ने मतदान किया, जिसमें साई देसाई ने अध्यक्ष पद पर 1,200 से अधिक वोट प्राप्त कर 800 वोटों के भारी अंतर से जीत हासिल की।

साई देसाई, जो कुनकोलीम के एक मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते हैं, गोवा विश्वविद्यालय में पर्यावरण विज्ञान के छात्र हैं। वे एनएसयूआई के सक्रिय सदस्य रहे हैं और पिछले दो वर्षों से कैंपस में छात्र मुद्दों—जैसे फीस वृद्धि, हॉस्टल सुविधाओं की कमी और प्लेसमेंट संकट—पर आवाज उठाते रहे हैं। उनकी जीत को कांग्रेस के विधायक एल्टोन डिसूजा ने “युवा शक्ति का प्रतीक” बताते हुए बधाई दी। इसी तरह, विपक्ष के नेता माइकल अलेमाओ ने कहा, “यह जीत छात्रों की एकजुटता का प्रमाण है। साई देसाई जैसे युवा नेता ही गोवा के भविष्य को मजबूत बनाएंगे।” देसाई ने अपनी पहली प्रतिक्रिया में कहा, “यह मेरी व्यक्तिगत जीत नहीं, बल्कि उन सभी छात्रों की जीत है जो वर्षों से परिषद में बदलाव की मांग कर रहे थे। हम फीस संरचना में पारदर्शिता, बेहतर खेल सुविधाएं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को बढ़ावा देंगे।”

गठबंधन की अन्य प्रमुख जीतें भी उल्लेखनीय हैं। उपाध्यक्ष पद पर जीएफपी की उम्मीदवार रिया फर्नांडिस ने 950 वोट हासिल कर अपनी निकटतम प्रतिद्वंद्वी को 400 वोटों से पीछे छोड़ दिया। फर्नांडिस, जो समाजशास्त्र की छात्रा हैं, ने चुनाव अभियान में महिलाओं के मुद्दों—जैसे सुरक्षित कैंपस और लिंग संवेदनशीलता—पर जोर दिया। महासचिव पद पर अजय नायक, एक दलित समुदाय से आने वाले छात्र, ने 1,100 वोटों से जीत दर्ज की। नायक ने कहा, “परिषद अब सभी वर्गों के छात्रों की आवाज बनेगी। हम आरक्षण नीतियों को मजबूत करने और पिछड़े छात्रों के लिए छात्रवृत्ति कार्यक्रम शुरू करेंगे।” कोषाध्यक्ष पद पर विनीत पोंडा और संयुक्त सचिव पर नेहा सावंत ने भी आराम से जीत हासिल की। ये परिणाम गठबंधन की रणनीति की सफलता को दर्शाते हैं, जिसमें घर-घर जाकर छात्रों से संपर्क और सोशल मीडिया अभियान का बड़ा योगदान रहा।

यह जीत 15 वर्ष पुरानी यादें ताजा कर देती है। 2010 में, तत्कालीन कांग्रेस-एनएसआरपी गठबंधन ने परिषद पर कब्जा किया था, लेकिन उसके बाद भाजपा की छात्र इकाई एबीवीपी और भाजयुमो ने लगातार दबदबा बनाए रखा। 2015 और 2020 के चुनावों में विपक्षी गठबंधन नाकाम रहा, जिसका कारण आंतरिक कलह और अभियान की कमी मानी जाती है। इस बार, जीएफपी अध्यक्ष विजय सरदेसाई की सक्रिय भूमिका निर्णायक साबित हुई। सरदेसाई ने कहा, “यह जीत एकता की ताकत है। कड़ी मेहनत और छात्रों के प्रगतिशील विजन पर भरोसे का नतीजा है। लोकतंत्र जीता, एकता काम आई।” उनकी यह टिप्पणी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई, जहां हजारों छात्रों ने इसे रीट्वीट किया।

परिषद चुनाव का महत्व केवल कैंपस तक सीमित नहीं है। गोवा जैसे छोटे राज्य में छात्र राजनीति राज्य स्तरीय राजनीति का पूर्वानुमान देती है। 2022 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस-जीएफपी गठबंधन की हार के बाद यह जीत उनके लिए मनोबल बढ़ाने वाली है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह युवा वोटरों के बीच विपक्ष की लोकप्रियता को मजबूत करेगी। गोवा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. वरुण सहगल ने परिणामों का स्वागत करते हुए कहा, “नई परिषद छात्र कल्याण के लिए नई पहल करेगी। हम उनका पूरा सहयोग देंगे।” लेकिन भाजपा की ओर से प्रतिक्रिया मिली-जुली रही। भाजपा प्रवक्ता गिरीराज पाई वर्नेकर ने इसे “सामयिक जीत” बताते हुए कहा, “यह छात्रों का फैसला है, लेकिन हम अपनी युवा नीतियों पर कायम रहेंगे।”

चुनाव अभियान के दौरान कई रोचक घटनाएं घटीं। पहले चरण में, भाजपा समर्थित पैनल ने कैंपस में पोस्टर युद्ध छेड़ दिया, लेकिन गठबंधन ने डिजिटल कैंपेन से जवाब दिया। इंस्टाग्राम और ट्विटर पर #UnityForGoaUniversity हैशटैग ट्रेंडिंग रहा, जिसमें छात्रों ने अपनी समस्याओं के वीडियो शेयर किए। एक घटना में, हॉस्टल छात्रों ने फीस वृद्धि के खिलाफ धरना दिया, जो गठबंधन के पक्ष में गया। इसके अलावा, पर्यावरण मुद्दों पर फोकस—जैसे तालेगांव कैंपस में हरित ऊर्जा—ने युवाओं को आकर्षित किया। साई देसाई ने वादा किया है कि परिषद अगले सत्र में ‘ग्रीन कैंपस इनिशिएटिव’ शुरू करेगी।

यह जीत छात्रों के लिए कई सबक देती है। पहला, एकता में शक्ति है। कांग्रेस और जीएफपी, जो वैचारिक रूप से अलग हैं, ने मुद्दों पर समझौता कर सफलता पाई। दूसरा, डिजिटल मीडिया की भूमिका। पारंपरिक रैलियों के अलावा, लाइव सेशंस और मीम्स ने युवाओं को जोड़ा। तीसरा, मुद्दे-केंद्रित राजनीति। गठबंधन ने नारे नहीं, समस्याओं के समाधान पर जोर दिया—जैसे ऑनलाइन लाइब्रेरी का विस्तार और मेंटल हेल्थ सपोर्ट। लेकिन चुनौतियां भी हैं। नई परिषद को भाजपा-प्रभावित प्रशासन से जूझना पड़ेगा। कुलपति कार्यालय से फंडिंग में देरी की शिकायतें आम हैं। देसाई ने कहा, “हम पारदर्शी बजट और वार्षिक रिपोर्ट जारी करेंगे।”

राज्य स्तर पर, यह जीत 2027 के विधानसभा चुनावों का संकेत दे सकती है। जीएफपी, जो 2017 में उभरी, ने अपनी युवा अपील साबित की। सरदेसाई की रणनीति—जिसमें स्थानीय मुद्दों को जोड़ना शामिल है—काम आई। कांग्रेस के लिए, यह एनएसयूआई को पुनर्जीवित करने का मौका है। अलेमाओ ने कहा, “यह युवाओं का मंडेट है, जो पूरे गोवा में फैलेगा।” दूसरी ओर, भाजपा को अपनी छात्र रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ेगा। वर्नेकर की टिप्पणी के बावजूद, पार्टी आंतरिक समीक्षा कर रही है।

गोवा विश्वविद्यालय का इतिहास समृद्ध है। 1985 में स्थापित, यह राज्य का गौरव है, जहां 5,000 से अधिक छात्र पढ़ते हैं। छात्र परिषद यहां सांस्कृतिक, खेल और शैक्षणिक गतिविधियों का केंद्र है। पिछले वर्षों में, परिषद ने ‘यूथ फेस्टिवल’ जैसे कार्यक्रम आयोजित किए, लेकिन आलोचना भी झेली—जैसे बजट में अस्पष्टता। नई परिषद इन कमियों को दूर करने का वादा कर रही है। साई देसाई ने पहली बैठक में एजेंडा रखा: “छात्रों की भागीदारी बढ़ाना और विश्वविद्यालय को राष्ट्रीय स्तर का बनाना।”

अंत में, यह जीत गोवा के छात्रों के लिए आशा की किरण है। 15 वर्षों का इंतजार समाप्त हुआ, और एक नया अध्याय शुरू हो गया। क्या यह राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव लाएगा? समय बताएगा। लेकिन फिलहाल, कैंपस में जश्न का माहौल है। छात्र नारे लगा रहे हैं: “एकता जिंदाबाद, छात्र शक्ति जिंदाबाद!” यह जीत साबित करती है कि युवा, जब संगठित होते हैं, तो कोई भी दीवार तोड़ सकते हैं।

Goa Khabar Nama
Author: Goa Khabar Nama

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