मुंबई/गोवा — रेडकर और बागकर द्वारा दायर की गई अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय (High Court) ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है। इस आदेश के साथ ही अदालत ने मामले की अगली सुनवाई की तारीख तय करते हुए राज्य सरकार/जांच एजेंसी से जवाब तलब किया है। यह मामला हाल के दिनों में चर्चा का विषय बना हुआ है और कानूनी हलकों में इसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, रेडकर और बागकर के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी (FIR) के आधार पर जांच एजेंसी द्वारा कार्रवाई की जा रही थी। दोनों आवेदकों ने आशंका जताई कि उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है, जिसके चलते उन्होंने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 438 के तहत अग्रिम जमानत के लिए उच्च न्यायालय का रुख किया। याचिकाओं में यह तर्क दिया गया कि वे जांच में सहयोग करने को तैयार हैं और उनके खिलाफ लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया विवादित तथा अतिरंजित हैं।
रेडकर और बागकर की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि प्राथमिकी में लगाए गए आरोप तथ्यों के विपरीत हैं और आवेदकों को झूठा फंसाया गया है। उन्होंने कहा कि गिरफ्तारी की स्थिति में आवेदकों की प्रतिष्ठा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी।
वकीलों ने यह भी रेखांकित किया कि आवेदक स्थानीय निवासी हैं, उनका स्थायी पता है, वे फरार होने वाले नहीं हैं और जांच में पूर्ण सहयोग देंगे। इसके अलावा, उन्होंने यह तर्क रखा कि मामले में दस्तावेजी साक्ष्य पहले से ही जांच एजेंसी के पास हैं, ऐसे में हिरासत में लेकर पूछताछ की आवश्यकता नहीं है।
दूसरी ओर, राज्य सरकार/जांच एजेंसी की ओर से पेश वकील ने अदालत से समय मांगा ताकि वे विस्तृत जवाब दाखिल कर सकें। उन्होंने संकेत दिया कि मामले की जांच प्रारंभिक चरण में है और कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों की जांच अभी शेष है। जांच एजेंसी का कहना है कि आरोपों की गंभीरता को देखते हुए अग्रिम जमानत दिए जाने से जांच प्रभावित हो सकती है।
दोनों पक्षों की प्रारंभिक दलीलें सुनने के बाद उच्च न्यायालय ने मामले की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए संबंधित प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया। अदालत ने कहा कि वह सभी पक्षों को सुनकर ही कोई अंतिम निर्णय लेगी।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि नोटिस जारी करने का अर्थ यह नहीं है कि अग्रिम जमानत स्वतः मंजूर हो गई है, बल्कि यह एक प्रक्रिया का हिस्सा है ताकि राज्य अपना पक्ष रिकॉर्ड पर रख सके। साथ ही, अदालत ने अगली सुनवाई की तारीख निर्धारित की और तब तक अंतरिम संरक्षण (Interim Protection) पर विचार करने का संकेत दिया।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अग्रिम जमानत मामलों में हाईकोर्ट का यह रुख संतुलित माना जाता है। नोटिस जारी कर राज्य से जवाब मांगना न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता को दर्शाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, अंतिम आदेश तथ्यों, आरोपों की प्रकृति, जांच की स्थिति और आवेदकों के आचरण पर निर्भर करेगा।
अग्रिम जमानत भारतीय न्याय प्रणाली में व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा का एक महत्वपूर्ण उपाय है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी व्यक्ति को केवल आरोपों के आधार पर अनावश्यक रूप से गिरफ्तार न किया जाए। हालांकि, अदालतें इसे स्वतः नहीं देतीं और प्रत्येक मामले में परिस्थितियों का सूक्ष्म मूल्यांकन करती हैं।
अब सभी की निगाहें उच्च न्यायालय की अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां राज्य सरकार/जांच एजेंसी अपना विस्तृत जवाब दाखिल करेगी। इसके बाद अदालत यह तय करेगी कि रेडकर और बागकर को अग्रिम जमानत दी जाए या नहीं, और यदि दी जाए तो किन शर्तों के साथ।
रेडकर और बागकर की अग्रिम जमानत याचिकाओं पर हाईकोर्ट द्वारा नोटिस जारी किया जाना इस मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी पड़ाव माना जा रहा है। यह फैसला न केवल संबंधित पक्षों के लिए, बल्कि समान प्रकृति के मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण को समझने के लिए भी अहम होगा। आने वाले दिनों में अदालत का अंतिम निर्णय इस मामले की दिशा तय करेगा।









