अंजुना–काइसुआ जैव विविधता पैनल ने वागाटोर बीच को कछुआ घोंसला स्थल घोषित करने की मांग की

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गोवा के प्रसिद्ध समुद्री तटों में शामिल वागाटोर बीच एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है, लेकिन इस बार कारण पर्यटन नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण है। अंजुना–काइसुआ जैव विविधता पैनल (Anjuna–Caisua Biodiversity Panel) ने वागाटोर बीच को आधिकारिक रूप से कछुओं का घोंसला स्थल (Turtle Nesting Site) घोषित करने की मांग की है। पैनल का कहना है कि यह क्षेत्र समुद्री कछुओं के प्रजनन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसे कानूनी संरक्षण की आवश्यकता है।

भारत के पश्चिमी तट पर स्थित गोवा के कई समुद्र तट ओलिव रिडले (Olive Ridley) और अन्य समुद्री कछुओं के लिए प्राकृतिक प्रजनन स्थल रहे हैं। हाल के वर्षों में वागाटोर बीच पर कछुओं के अंडे देने की घटनाएं सामने आई हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह क्षेत्र उनके लिए सुरक्षित और अनुकूल वातावरण प्रदान करता है। जैव विविधता पैनल का मानना है कि यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए, तो बढ़ती मानवीय गतिविधियां इस संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती हैं।

पैनल के सदस्यों ने बताया कि वागाटोर बीच पर हाल ही में कछुओं के घोंसले पाए गए हैं, जिन्हें स्थानीय स्वयंसेवकों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने सुरक्षित रखने का प्रयास किया। हालांकि, बीच पर रात के समय होने वाली पार्टियां, तेज रोशनी, लाउड म्यूजिक, वाहनों की आवाजाही और असंयमित पर्यटन गतिविधियां कछुओं के लिए खतरा बनती जा रही हैं। समुद्री कछुए आमतौर पर अंधेरे और शांत वातावरण में अंडे देते हैं। कृत्रिम रोशनी के कारण न केवल मादा कछुए घोंसला बनाने से कतराती हैं, बल्कि अंडों से निकलने वाले बच्चे भी समुद्र की दिशा पहचानने में भ्रमित हो जाते हैं।

अंजुना–काइसुआ जैव विविधता पैनल ने गोवा सरकार, वन विभाग और तटीय नियामक प्राधिकरण से अपील की है कि वागाटोर बीच को आधिकारिक तौर पर संरक्षित कछुआ घोंसला क्षेत्र घोषित किया जाए। इससे न केवल कछुओं के संरक्षण में मदद मिलेगी, बल्कि जैव विविधता संरक्षण के प्रति गोवा की प्रतिबद्धता भी मजबूत होगी।

पैनल का यह भी कहना है कि वागाटोर बीच का पारिस्थितिक महत्व केवल कछुओं तक सीमित नहीं है। यह क्षेत्र कई समुद्री जीवों, पक्षियों और तटीय वनस्पतियों का भी प्राकृतिक आवास है। यदि इस तट को संरक्षित क्षेत्र का दर्जा मिलता है, तो यहां नियंत्रित और जिम्मेदार पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सकता है, जिससे पर्यावरण और स्थानीय अर्थव्यवस्था दोनों को लाभ होगा।

स्थानीय निवासियों और मछुआरा समुदाय ने भी इस मांग का समर्थन किया है। उनका कहना है कि समुद्री कछुए तटीय पारिस्थितिकी तंत्र का अहम हिस्सा हैं और उनकी संख्या में गिरावट समुद्र के स्वास्थ्य के लिए खतरे की घंटी है। कई बुजुर्ग मछुआरों का कहना है कि पहले वागाटोर और आसपास के समुद्र तटों पर कछुए आम दिखाई देते थे, लेकिन अब उनकी संख्या में स्पष्ट कमी आई है।

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि कछुओं का संरक्षण केवल एक प्रजाति को बचाने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह पूरे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने से जुड़ा है। समुद्री कछुए जेलीफिश जैसी प्रजातियों की संख्या को नियंत्रित करते हैं और समुद्री घास के मैदानों को स्वस्थ बनाए रखने में मदद करते हैं। यदि कछुए विलुप्त होते हैं, तो इसका असर मछलियों, प्रवाल भित्तियों और अंततः मानव जीवन पर भी पड़ेगा।

जैव विविधता पैनल ने सुझाव दिया है कि वागाटोर बीच पर कछुआ घोंसला संरक्षण के लिए विशेष दिशानिर्देश बनाए जाएं। इनमें प्रजनन मौसम के दौरान रात में रोशनी पर प्रतिबंध, वाहनों की आवाजाही पर नियंत्रण, बीच पर शोर कम करना और पर्यटकों को जागरूक करना शामिल है। इसके अलावा, स्थानीय स्वयंसेवकों और स्कूलों की मदद से जागरूकता कार्यक्रम चलाने की भी सिफारिश की गई है।

गोवा पहले से ही मोरजिम और गलगिबाग जैसे समुद्र तटों पर कछुआ संरक्षण कार्यक्रमों के लिए जाना जाता है। इन क्षेत्रों में किए गए प्रयासों से कछुओं की संख्या में सकारात्मक बदलाव देखा गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि वागाटोर बीच को भी इसी तरह का संरक्षण मिलता है, तो यह एक और सफल उदाहरण बन सकता है।

सरकारी अधिकारियों ने पैनल की मांग पर विचार करने का आश्वासन दिया है। वन विभाग के एक अधिकारी ने कहा कि कछुआ घोंसला स्थलों की पहचान और संरक्षण सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। संबंधित विभागों से रिपोर्ट मिलने के बाद आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।

अंततः, वागाटोर बीच को कछुआ घोंसला स्थल घोषित करने की मांग केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक विरासत को बचाने का प्रयास है। यदि समय रहते संतुलित और दूरदर्शी निर्णय लिए गए, तो गोवा न केवल पर्यटन का केंद्र बना रहेगा, बल्कि जैव विविधता संरक्षण का भी एक आदर्श मॉडल प्रस्तुत कर सकेगा।

Goa Khabar Nama
Author: Goa Khabar Nama

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