कृषि क्षेत्र: नीतिगत बदलावों, जलवायु चुनौतियों और किसानों के अदम्य साहस का वर्ष
वर्ष 2024–25 भारतीय कृषि के लिए एक ऐसा दौर रहा, जिसमें नीतिगत बदलाव, जलवायु संकट और किसानों की जिजीविषा तीनों एक साथ देखने को मिली। यह साल केवल फसलों के उतार-चढ़ाव का नहीं, बल्कि नीतियों की दिशा, मौसम की अनिश्चितता और किसान समुदाय की सहनशक्ति की परीक्षा का वर्ष भी रहा। कृषि, जो भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है, इस दौरान कई मोर्चों पर जूझती और स्वयं को ढालती दिखाई दी।
इस वर्ष सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र में कई अहम नीतिगत निर्णय लिए गए। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को लेकर चर्चाएं तेज रहीं। कुछ फसलों के MSP में बढ़ोतरी ने किसानों को राहत दी, तो वहीं लागत में निरंतर वृद्धि ने लाभ को सीमित कर दिया। सरकार ने डिजिटल कृषि मिशन, किसान क्रेडिट कार्ड के विस्तार और ई-नाम (e-NAM) जैसे प्लेटफॉर्म को मजबूत करने पर जोर दिया, जिससे किसानों को बाजार से सीधे जुड़ने का अवसर मिला।
हालांकि, जमीनी स्तर पर इन नीतियों का लाभ सभी किसानों तक समान रूप से नहीं पहुंच सका। छोटे और सीमांत किसानों को अभी भी बिचौलियों, ऋण के बोझ और बाजार की अस्थिरता से जूझना पड़ा। इसके बावजूद, कृषि सुधारों की दिशा में उठाए गए कदमों ने भविष्य के लिए एक आधार जरूर तैयार किया।
इस वर्ष कृषि के सामने सबसे गंभीर चुनौती जलवायु परिवर्तन के रूप में सामने आई। कहीं बेमौसम बारिश ने फसलों को नुकसान पहुंचाया, तो कहीं लंबे सूखे ने किसानों की उम्मीदों को झुलसा दिया। अत्यधिक गर्मी, अनियमित मानसून और अचानक आई प्राकृतिक आपदाओं ने खेती को और अधिक जोखिम भरा बना दिया।
धान, गेहूं, दालें और सब्ज़ी उत्पादन पर मौसम की मार साफ़ देखी गई। कई राज्यों में बाढ़ ने खड़ी फसलों को तबाह कर दिया, जबकि कुछ इलाकों में पानी की भारी कमी रही। जलवायु परिवर्तन ने यह स्पष्ट कर दिया कि पारंपरिक खेती के तरीकों में बदलाव अब अनिवार्य हो गया है।
इन तमाम चुनौतियों के बावजूद भारतीय किसान ने हार नहीं मानी। यही इस वर्ष की सबसे बड़ी कहानी रही—किसानों का अदम्य साहस और नवाचार। कई किसानों ने जलवायु-स्मार्ट खेती को अपनाया, जैसे ड्रिप इरिगेशन, मल्चिंग, जैविक खेती और फसल विविधीकरण।
कई ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों ने मोटे अनाज (मिलेट्स) की खेती की ओर रुख किया, जो कम पानी में भी बेहतर उत्पादन देते हैं। सरकार द्वारा ‘श्री अन्न’ (मिलेट्स) को बढ़ावा देने की पहल ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके अलावा, कुछ किसानों ने तकनीक का सहारा लेकर मोबाइल ऐप्स, मौसम पूर्वानुमान और डिजिटल मंडियों का उपयोग शुरू किया।
हालांकि, किसानों की आर्थिक स्थिति अब भी चिंता का विषय बनी हुई है। उर्वरक, बीज, डीज़ल और कीटनाशकों की बढ़ती कीमतों ने लागत बढ़ा दी। कई किसान कर्ज के बोझ तले दबे रहे, जिससे मानसिक तनाव भी बढ़ा। इस वर्ष किसान आत्महत्याओं की खबरों ने एक बार फिर कृषि संकट की गंभीरता को उजागर किया।
दूसरी ओर, स्वयं सहायता समूहों, किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) और सहकारी समितियों की भूमिका मजबूत होती दिखाई दी। इन संगठनों ने किसानों को सामूहिक शक्ति, बेहतर मूल्य और बाजार तक पहुंच दिलाने में मदद की।
इस वर्ष कृषि में महिलाओं और युवाओं की भागीदारी भी एक सकारात्मक संकेत के रूप में उभरी। महिलाएं न केवल खेतों में श्रम कर रही हैं, बल्कि निर्णय लेने और उद्यमिता में भी आगे आ रही हैं। वहीं, कुछ युवा आधुनिक तकनीक और स्टार्टअप मॉडल के साथ खेती को एक व्यवसाय के रूप में देखने लगे हैं।
एग्री-स्टार्टअप्स, फूड प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन के क्षेत्रों में नई संभावनाएं दिखीं। इससे यह उम्मीद जगी कि आने वाले वर्षों में कृषि केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि एक टिकाऊ और लाभकारी क्षेत्र बन सकता है।
यह वर्ष यह सिखा गया कि कृषि को केवल परंपरा के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। नीति, तकनीक, पर्यावरण और किसान—इन चारों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए दीर्घकालिक रणनीति, किसानों को आर्थिक सुरक्षा और स्थानीय स्तर पर समाधान आज की आवश्यकता है।
सरकार, वैज्ञानिकों और किसानों के बीच बेहतर समन्वय से ही कृषि को संकट से उबारा जा सकता है। किसानों की मेहनत और सहनशक्ति ने यह साबित कर दिया है कि कठिन हालात में भी वे देश का पेट भरने का साहस रखते हैं।
कुल मिलाकर, यह वर्ष भारतीय कृषि के लिए संघर्ष और उम्मीद—दोनों का प्रतीक रहा। नीतिगत बदलावों ने दिशा दी, जलवायु चुनौतियों ने चेताया और किसानों की दृढ़ता ने प्रेरित किया। यदि इन अनुभवों से सीख लेकर ठोस कदम उठाए जाएं, तो आने वाले वर्ष कृषि के लिए अधिक सुरक्षित, समृद्ध और टिकाऊ साबित हो सकते हैं।










